जशपुर दुष्कर्म केस में आरक्षक को झटका, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अग्रिम जमानत याचिका की खारिज

बिलासपुर
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दुष्कर्म के मामले में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि पुलिस अधिकारी के पास राज्य की ओर से मिली संस्थागत शक्ति होती है और वह वर्चस्व की स्थिति में रहता है। ऐसे में पीड़िता की सहमति को सामान्य अर्थ में स्वतंत्र सहमति नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह कानूनी कार्रवाई के भय या दबाव में भी संबंध के लिए सहमत हो सकती है। इस टिप्पणी के साथ जस्टिस राकेश मोहन पांडेय ने आदिवासी विधवा महिला से दुष्कर्म के आरोपित आरक्षक रूद्रमणी यादव की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।
मामला जशपुर जिले के कांसाबेल थाना क्षेत्र का है। आरक्षक रूद्रमणी यादव, निवासी तंगरडीह जशपुर ने एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 14-ए(2) के तहत आपराधिक अपील पेश कर 30 अप्रैल 2026 के विशेष न्यायाधीश, एससी/एसटी एक्ट जशपुर के आदेश को चुनौती दी थी। उसके खिलाफ कांसाबेल थाने में अपराध दर्ज है। इसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(एन) और एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(2)(वी) के तहत आरोप हैं।
अभियोजन के अनुसार पीड़िता ने शिकायत में आरोप लगाया कि वर्ष 2023 में फेसबुक के जरिए उसकी आरोपी से पहचान हुई। इसके बाद दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई। आरोप है कि आरोपित ने महिला को अपने प्रभाव में लेकर कई बार जबरन शारीरिक संबंध बनाए। इससे महिला गर्भवती हो गई और आरोप है कि बाद में उसका गर्भपात करा दिया गया। शिकायत में यह भी आरोप है कि इसके बाद आरोपित महिला को धमकाने और परेशान करने लगा। उसकी तस्वीरें रिश्तेदारों और परिचितों के बीच प्रसारित करने का भी आरोप लगाया गया है। इसके अलावा जमीन दिलाने के नाम पर महिला और उसके भाई से दो लाख रुपये लेने का आरोप भी लगाया गया।
आरोपी ने कहा- तीन साल तक सहमति से था संबंध
अग्रिम जमानत के लिए आरोपित की ओर से दलील दी गई कि वह और पीड़िता जनवरी 2023 से एक-दूसरे को जानते थे और दोनों बालिग हैं। लंबे समय तक दोनों के बीच सहमति से संबंध रहे। आरोपी पक्ष ने कहा कि पीड़िता दो बच्चों की मां है और उसने करीब तीन साल तक कोई शिकायत नहीं की। इसलिए एफआईआर में हुई देरी के आधार पर आरोपी ने उसे झूठा फंसाए जाने की बात कही।
आरोपित ने एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(2)(वी) के आरोप पर भी आपत्ति जताते हुए कहा कि ऐसा कोई प्रथम दृष्टया साक्ष्य नहीं है कि कथित अपराध पीड़िता की जाति के कारण किया गया। आरोपी का कोई आपराधिक पूर्ववृत्त नहीं होने की दलील भी दी गई। बचाव पक्ष ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के दिनेश कुमार श्रीवास्तव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले का हवाला देते हुए लंबे समय के सहमति वाले संबंध में अग्रिम जमानत दिए जाने की बात कही।
राज्य ने कहा- पुलिसकर्मी ने पद का फायदा उठाया
राज्य की ओर से अग्रिम जमानत का विरोध किया गया। बताया गया कि पीड़िता अनुसूचित जनजाति वर्ग की विधवा महिला है और आरोपी पुलिस कर्मचारी है। आरोप है कि उसने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए महिला के साथ
संबंध बनाए और बाद में उसका शोषण किया।
राज्य ने कोर्ट को बताया कि जांच के दौरान पीड़िता का चिकित्सकीय परीक्षण कराया गया, जिसमें पुराने हाइमेन के फटने और यौन संबंध की आदत संबंधी निष्कर्ष दर्ज किए गए हैं। पीड़िता का जाति प्रमाणपत्र भी जांच में जब्त किया गया है।
पुलिस की वर्दी और अधिकार से प्रभावित हो सकती है सहमति
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने आरोपित के इस बचाव को स्वीकार नहीं किया कि दोनों के बीच सहमति से संबंध थे। कोर्ट ने कहा कि पुलिस अधिकारी के पास राज्य की ओर से मिली संस्थागत शक्ति होती है। वह वर्चस्व की स्थिति में रहता है। ऐसे में पीड़िता कई बार अपनी स्वतंत्र इच्छा से नहीं, बल्कि कानूनी कार्रवाई के भय के कारण भी संबंध के लिए सहमत हो सकती है। कोर्ट ने कहा कि इस कारण वर्तमान मामले में सहमति से संबंध होने की दलील को आरोपी के बचाव के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
आरोपी का मामला दूसरे फैसले से अलग
हाई कोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामले में वर्ष 2023 से लगातार जबरन शारीरिक संबंध बनाने, गर्भावस्था और गर्भपात, धमकी, उत्पीड़न, तस्वीरें प्रसारित करने तथा दो लाख रुपये लेने जैसे गंभीर आरोप हैं। जांच में सामने आए चिकित्सकीय और अन्य दस्तावेज भी रिकार्ड पर हैं। कोर्ट ने आरोपी पक्ष की ओर से उद्धृत इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले से वर्तमान मामले को अलग माना।
हाई कोर्ट ने कहा कि उस मामले में लंबे समय के सहमति वाले संबंध के तथ्यों के आधार पर राहत दी गई थी, जबकि यहां आरोप बार-बार जबरन संबंध बनाने और उसके बाद शोषण एवं उत्पीड़न के हैं। इन्हीं आधार पर जस्टिस राकेश मोहन पांडेय ने रूद्रमणी यादव को अग्रिम जमानत का लाभ देने से इनकार करते हुए उसकी जमानत अर्जी खारिज कर दी।



